ek hijrat ki aawazon ka

ek hijrat ki aawazon ka 

koi bain sune darwazon ka 


zakariyya peDon ki mat sun 

ye jangal hai KHamyazon ka 


tere sar mein soz nahin pyare 

tu ahl nahin mere sazon ka 


auron ko salahen deta hai 

koi Dasa hua andazon ka 


mera naKHra karna banta hai 

main ghazi hun tere ghazon ka 


ek reDhi wala munkir hai 

teri topon aur jahazon ka 

اک ہجرت کی آوازوں کا 

کوئی بین سنے دروازوں کا 


زکریا پیڑوں کی مت سن 

یہ جنگل ہے خمیازوں کا 


ترے سر میں سوز نہیں پیارے 

تو اہل نہیں مرے سازوں کا 


اوروں کو صلاحیں دیتا ہے 

کوئی ڈسا ہوا اندازوں کا 


مرا نخرہ کرنا بنتا ہے 

میں غازی ہوں ترے غازوں کا 


اک ریڑھی والا منکر ہے 

تری توپوں اور جہازوں کا 

इक हिजरत की आवाज़ों का 

कोई बैन सुने दरवाज़ों का 


ज़करिय्या पेड़ों की मत सुन 

ये जंगल है ख़मयाज़ों का 


तिरे सर में सोज़ नहीं प्यारे 

तू अहल नहीं मिरे साज़ों का 


औरों को सलाहें देता है 

कोई डसा हुआ अंदाज़ों का 


मिरा नख़रा करना बनता है 

मैं ग़ाज़ी हूँ तिरे गाज़ों का 


इक रेढ़ी वाला मुंकिर है 

तिरी तोपों और जहाज़ों का 


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