ghazal ke misra ko misra se joDa jata hai

ghazal ke misra ko misra se joDa jata hai 

tamam raat ghamon ko nichoDa jata hai 


purane jal se bahar nikalna mushkil hai 

isi liye to riwayat ko toDa jata hai 


utar gaya hun to ab jitna hi manzil hai 

yun hum se bhi kahan maidan chhoDa jata hai 


uThana paDta hai phir hath gar nahin sudhre 

han pahli bar mein hathon ko joDa jata hai 


yahan pe hindu bhi honge yahan musalman bhi 

ye shairi hai yahan sab ko joDa jata hai 


dikha diya mere dushman ne dosti kar ke 

ghurur TuTa nahin hai to toDa jata hai 


likha tha nam jahan tu ne KHun-e-dil se mera 

wahin se ishq ke kaghaz ko moDa jata hai 

غزل کے مصرع کو مصرع سے جوڑا جاتا ہے 

تمام رات غموں کو نچوڑا جاتا ہے 


پرانے جال سے باہر نکلنا مشکل ہے 

اسی لیے تو روایت کو توڑا جاتا ہے 


اتر گیا ہوں تو اب جیتنا ہی منزل ہے 

یوں ہم سے بھی کہاں میدان چھوڑا جاتا ہے 


اٹھانا پڑتا ہے پھر ہاتھ گر نہیں سدھرے 

ہاں پہلی بار میں ہاتھوں کو جوڑا جاتا ہے 


یہاں پہ ہندو بھی ہوں گے یہاں مسلماں بھی 

یہ شاعری ہے یہاں سب کو جوڑا جاتا ہے 


دکھا دیا مرے دشمن نے دوستی کر کے 

غرور ٹوٹا نہیں ہے تو توڑا جاتا ہے 


لکھا تھا نام جہاں تو نے خون دل سے مرا 

وہیں سے عشق کے کاغذ کو موڑا جاتا ہے 

ग़ज़ल के मिस्रा को मिस्रा से जोड़ा जाता है 

तमाम रात ग़मों को निचोड़ा जाता है 


पुराने जाल से बाहर निकलना मुश्किल है 

इसी लिए तो रिवायत को तोड़ा जाता है 


उतर गया हूँ तो अब जीतना ही मंज़िल है 

यूँ हम से भी कहाँ मैदान छोड़ा जाता है 


उठाना पड़ता है फिर हाथ गर नहीं सुधरे 

हाँ पहली बार में हाथों को जोड़ा जाता है 


यहाँ पे हिन्दू भी होंगे यहाँ मुसलमाँ भी 

ये शाइरी है यहाँ सब को जोड़ा जाता है 


दिखा दिया मिरे दुश्मन ने दोस्ती कर के 

ग़ुरूर टूटा नहीं है तो तोड़ा जाता है 


लिखा था नाम जहाँ तू ने ख़ून-ए-दिल से मिरा 

वहीं से इश्क़ के काग़ज़ को मोड़ा जाता है 


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