guman yahi hai ki dil KHud udhar ko jata hai

guman yahi hai ki dil KHud udhar ko jata hai 

so shak ka faeda us ki nazar ko jata hai 


haden wafa ki bhi aaKHir hawas se milti hain 

ye rasta bhi idhar se udhar ko jata hai 


ye dil ka dard to umron ka rog hai pyare 

so jae bhi to pahar do pahar ko jata hai 


ye haal hai ki kai raste hain pesh-e-nazar 

magar KHayal teri rah-guzar ko jata hai 


tu 'anwari' hai na 'ghaalib' to phir ye kyun hai 'faraaz' 

har ek sail-e-bala tere ghar ko jata hai 

گماں یہی ہے کہ دل خود ادھر کو جاتا ہے 

سو شک کا فائدہ اس کی نظر کو جاتا ہے 


حدیں وفا کی بھی آخر ہوس سے ملتی ہیں 

یہ راستہ بھی ادھر سے ادھر کو جاتا ہے 


یہ دل کا درد تو عمروں کا روگ ہے پیارے 

سو جائے بھی تو پہر دو پہر کو جاتا ہے 


یہ حال ہے کہ کئی راستے ہیں پیش نظر 

مگر خیال تری رہگزر کو جاتا ہے 


تو انوریؔ ہے نہ غالبؔ تو پھر یہ کیوں ہے فرازؔ 

ہر ایک سیل بلا تیرے گھر کو جاتا ہے 

गुमाँ यही है कि दिल ख़ुद उधर को जाता है 

सो शक का फ़ाएदा उस की नज़र को जाता है 


हदें वफ़ा की भी आख़िर हवस से मिलती हैं 

ये रास्ता भी इधर से उधर को जाता है 


ये दिल का दर्द तो उम्रों का रोग है प्यारे 

सो जाए भी तो पहर दो पहर को जाता है 


ये हाल है कि कई रास्ते हैं पेश-ए-नज़र 

मगर ख़याल तिरी रह-गुज़र को जाता है 


तू 'अनवरी' है न 'ग़ालिब' तो फिर ये क्यूँ है 'फ़राज़' 

हर एक सैल-ए-बला तेरे घर को जाता है 


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