KHamosh ho kyun dad-e-jafa kyun nahin dete

KHamosh ho kyun dad-e-jafa kyun nahin dete 

bismil ho to qatil ko dua kyun nahin dete 


wahshat ka sabab rauzan-e-zindan to nahin hai 

mehr o mah o anjum ko bujha kyun nahin dete 


ek ye bhi to andaz-e-ilaj-e-gham-e-jaan hai 

ai chaaragaro dard baDha kyun nahin dete 


munsif ho agar tum to kab insaf karoge 

mujrim hain agar hum to saza kyun nahin dete 


rahzan ho to hazir hai mata-e-dil-o-jaan bhi 

rahbar ho to manzil ka pata kyun nahin dete 


kya bit gai ab ke 'faraaz' ahl-e-chaman par 

yaran-e-qafas mujh ko sada kyun nahin dete 

خاموش ہو کیوں داد جفا کیوں نہیں دیتے 

بسمل ہو تو قاتل کو دعا کیوں نہیں دیتے 


وحشت کا سبب روزن زنداں تو نہیں ہے 

مہر و مہ و انجم کو بجھا کیوں نہیں دیتے 


اک یہ بھی تو انداز علاج غم جاں ہے 

اے چارہ گرو درد بڑھا کیوں نہیں دیتے 


منصف ہو اگر تم تو کب انصاف کرو گے 

مجرم ہیں اگر ہم تو سزا کیوں نہیں دیتے 


رہزن ہو تو حاضر ہے متاع دل و جاں بھی 

رہبر ہو تو منزل کا پتہ کیوں نہیں دیتے 


کیا بیت گئی اب کے فرازؔ اہل چمن پر؟ 

یاران قفس مجھ کو صدا کیوں نہیں دیتے 

ख़ामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते 

बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते 


वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है 

मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते 


इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है 

ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते 


मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे 

मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते 


रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी 

रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते 


क्या बीत गई अब के 'फ़राज़' अहल-ए-चमन पर 

यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँ नहीं देते 


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