le uDa phir koi KHayal hamein

le uDa phir koi KHayal hamein 

saqiya saqiya sambhaal hamein 


ro rahe hain ki ek aadat hai 

warna itna nahin malal hamein 


KHalwati hain tere jamal ke hum 

aaine ki tarah sambhaal hamein 


marg-e-amboh jashn-e-shadi hai 

mil gae dost hasb-e-haal hamein 


iKHtilaf-e-jahan ka ranj na tha 

de gae mat ham-KHayal hamein 


kya tawaqqo karen zamane se 

ho bhi gar jurat-e-sawal hamein 


hum yahan bhi nahin hain KHush lekin 

apni mahfil se mat nikal hamein 


hum tere dost hain 'faraaz' magar 

ab na aur uljhanon mein Dal hamein 

لے اڑا پھر کوئی خیال ہمیں 

ساقیا ساقیا سنبھال ہمیں 


رو رہے ہیں کہ ایک عادت ہے 

ورنہ اتنا نہیں ملال ہمیں 


خلوتی ہیں ترے جمال کے ہم 

آئنے کی طرح سنبھال ہمیں 


مرگ انبوہ جشن شادی ہے 

مل گئے دوست حسب حال ہمیں 


اختلاف جہاں کا رنج نہ تھا 

دے گئے مات ہم خیال ہمیں 


کیا توقع کریں زمانے سے 

ہو بھی گر جرأت سوال ہمیں 


ہم یہاں بھی نہیں ہیں خوش لیکن 

اپنی محفل سے مت نکال ہمیں 


ہم ترے دوست ہیں فرازؔ مگر 

اب نہ اور الجھنوں میں ڈال ہمیں 

ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें 

साक़िया साक़िया सँभाल हमें 


रो रहे हैं कि एक आदत है 

वर्ना इतना नहीं मलाल हमें 


ख़ल्वती हैं तिरे जमाल के हम 

आइने की तरह सँभाल हमें 


मर्ग-ए-अम्बोह जश्न-ए-शादी है 

मिल गए दोस्त हस्ब-ए-हाल हमें 


इख़्तिलाफ़-ए-जहाँ का रंज न था 

दे गए मात हम-ख़याल हमें 


क्या तवक़्क़ो करें ज़माने से 

हो भी गर जुरअत-ए-सवाल हमें 


हम यहाँ भी नहीं हैं ख़ुश लेकिन 

अपनी महफ़िल से मत निकाल हमें 


हम तिरे दोस्त हैं 'फ़राज़' मगर 

अब न और उलझनों में डाल हमें 


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