na dil se aah na lab se sada nikalti hai

na dil se aah na lab se sada nikalti hai 

magar ye baat baDi dur ja nikalti hai 


sitam to ye hai ki ahd-e-sitam ke jate hi 

tamam KHalq meri ham-nawa nikalti hai 


visal-o-hijr ki hasrat mein ju-e-kam-maya 

kabhi kabhi kisi sahra mein ja nikalti hai 


main kya karun mere qatil na chahne par bhi 

tere liye mere dil se dua nikalti hai 


wo zindagi ho ki duniya 'faraaz' kya kije 

ki jis se ishq karo bewafa nikalti hai 

نہ دل سے آہ نہ لب سے صدا نکلتی ہے 

مگر یہ بات بڑی دور جا نکلتی ہے 


ستم تو یہ ہے کہ عہد ستم کے جاتے ہی 

تمام خلق مری ہم نوا نکلتی ہے 


وصال و ہجر کی حسرت میں جوئے کم مایہ 

کبھی کبھی کسی صحرا میں جا نکلتی ہے 


میں کیا کروں مرے قاتل نہ چاہنے پر بھی 

ترے لیے مرے دل سے دعا نکلتی ہے 


وہ زندگی ہو کہ دنیا فرازؔ کیا کیجے 

کہ جس سے عشق کرو بے وفا نکلتی ہے 

न दिल से आह न लब से सदा निकलती है 

मगर ये बात बड़ी दूर जा निकलती है 


सितम तो ये है कि अहद-ए-सितम के जाते ही 

तमाम ख़ल्क़ मिरी हम-नवा निकलती है 


विसाल-ओ-हिज्र की हसरत में जू-ए-कम-माया 

कभी कभी किसी सहरा में जा निकलती है 


मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी 

तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है 


वो ज़िंदगी हो कि दुनिया 'फ़राज़' क्या कीजे 

कि जिस से इश्क़ करो बेवफ़ा निकलती है 


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