na tera qurb na baada hai kya kiya jae

na tera qurb na baada hai kya kiya jae 

phir aaj dukh bhi ziyaada hai kya kiya jae 


hamein bhi arz-e-tamanna ka Dhab nahin aata 

mizaj-e-yar bhi sada hai kya kiya jae 


kuchh apne dost bhi tarkash-ba-dosh phirte hain 

kuchh apna dil bhi kushada hai kya kiya jae 


wo mehrban hai magar dil ki hirs bhi kam ho 

talab karam se ziyaada hai kya kiya jae 


na us se tark-e-talluq ki baat kar paen 

na hamdami ka irada hai kya kiya jae 


suluk-e-yar se dil Dubne laga hai 'faraaz' 

magar ye mahfil-e-ada hai kya kiya jae 

نہ تیرا قرب نہ بادہ ہے کیا کیا جائے 

پھر آج دکھ بھی زیادہ ہے کیا کیا جائے 


ہمیں بھی عرض تمنا کا ڈھب نہیں آتا 

مزاج یار بھی سادہ ہے کیا کیا جائے 


کچھ اپنے دوست بھی ترکش بدوش پھرتے ہیں 

کچھ اپنا دل بھی کشادہ ہے کیا کیا جائے 


وہ مہرباں ہے مگر دل کی حرص بھی کم ہو 

طلب کرم سے زیادہ ہے کیا کیا جائے 


نہ اس سے ترک تعلق کی بات کر پائیں 

نہ ہمدمی کا ارادہ ہے کیا کیا جائے 


سلوک یار سے دل ڈوبنے لگا ہے فرازؔ 

مگر یہ محفل اعدا ہے کیا کیا جائے 

न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या किया जाए 

फिर आज दुख भी ज़ियादा है क्या किया जाए 


हमें भी अर्ज़-ए-तमन्ना का ढब नहीं आता 

मिज़ाज-ए-यार भी सादा है क्या किया जाए 


कुछ अपने दोस्त भी तरकश-ब-दोश फिरते हैं 

कुछ अपना दिल भी कुशादा है क्या किया जाए 


वो मेहरबाँ है मगर दिल की हिर्स भी कम हो 

तलब करम से ज़ियादा है क्या किया जाए 


न उस से तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ की बात कर पाएँ 

न हमदमी का इरादा है क्या किया जाए 


सुलूक-ए-यार से दिल डूबने लगा है 'फ़राज़' 

मगर ये महफ़िल-ए-आदा है क्या किया जाए 


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