qamat ko tere sarw sanobar nahin kaha

qamat ko tere sarw sanobar nahin kaha 

jaisa bhi tu tha us se to baDh kar nahin kaha 


us se mile to zom-e-takallum ke bawajud 

jo soch kar gae wahi aksar nahin kaha 


itni murawwaten to kahan dushmanon mein thin 

yaron ne jo kaha mere munh par nahin kaha 


mujh sa gunahgar sar-e-dar kah gaya 

waiz ne jo suKHan sar-e-mimbar nahin kaha 


barham bas is KHata pe amiran-e-shahr hain 

in jauhaDon ko main ne samundar nahin kaha 


ye log meri fard-e-amal dekhte hain kyun 

main ne 'faraaz' KHud ko payambar nahin kaha 

قامت کو تیرے سرو صنوبر نہیں کہا 

جیسا بھی تو تھا اس سے تو بڑھ کر نہیں کہا 


اس سے ملے تو زعم تکلم کے باوجود 

جو سوچ کر گئے وہی اکثر نہیں کہا 


اتنی مروتیں تو کہاں دشمنوں میں تھیں 

یاروں نے جو کہا مرے منہ پر نہیں کہا 


مجھ سا گناہ گار سر دار کہہ گیا 

واعظ نے جو سخن سر منبر نہیں کہا 


برہم بس اس خطا پہ امیران شہر ہیں 

ان جوہڑوں کو میں نے سمندر نہیں کہا 


یہ لوگ میری فرد عمل دیکھتے ہیں کیوں 

میں نے فرازؔ خود کو پیمبر نہیں کہا 

क़ामत को तेरे सर्व सनोबर नहीं कहा 

जैसा भी तू था उस से तो बढ़ कर नहीं कहा 


उस से मिले तो ज़ोम-ए-तकल्लुम के बावजूद 

जो सोच कर गए वही अक्सर नहीं कहा 


इतनी मुरव्वतें तो कहाँ दुश्मनों में थीं 

यारों ने जो कहा मिरे मुँह पर नहीं कहा 


मुझ सा गुनाहगार सर-ए-दार कह गया 

वाइज़ ने जो सुख़न सर-ए-मिंबर नहीं कहा 


बरहम बस इस ख़ता पे अमीरान-ए-शहर हैं 

इन जौहड़ों को मैं ने समुंदर नहीं कहा 


ये लोग मेरी फ़र्द-ए-अमल देखते हैं क्यूँ 

मैं ने 'फ़राज़' ख़ुद को पयम्बर नहीं कहा 


SOURCE :

Book :

Edition :

Publication :

Advertizement


Coments