ye be-dili hai to kashti se yar kya utren

ye be-dili hai to kashti se yar kya utren 


udhar bhi kaun hai dariya ke par kya utren 


tamam daulat-e-jaan haar di mohabbat mein 


jo zindagi se liye the udhaar kya utren 


hazar jam se Takra ke jam KHali hon 


jo aa gae hain dilon mein ghubar kya utren 


basan-e-KHak sar-e-ku-e-yar baiThe hain 


ab is maqam se hum KHaksar kya utren 


na itr o ud na jam o subu na saz o surur 


faqir-e-shahr ke ghar shahryar kya utren 


hamein majal nahin hai ki baam tak pahunchen 


unhen ye aar sar-e-rahguzar kya utren 


jo zaKHm dagh bane hain wo bhar gae the 'faraaz' 


jo dagh zaKHm bane hain wo yar kya utren 

یہ بے دلی ہے تو کشتی سے یار کیا اتریں 


ادھر بھی کون ہے دریا کے پار کیا اتریں 


تمام دولت جاں ہار دی محبت میں 


جو زندگی سے لیے تھے ادھار کیا اتریں 


ہزار جام سے ٹکرا کے جام خالی ہوں 


جو آ گئے ہیں دلوں میں غبار کیا اتریں 


بسان خاک سر کوئے یار بیٹھے ہیں 


اب اس مقام سے ہم خاکسار کیا اتریں 


نہ عطر و عود نہ جام و سبو نہ ساز و سرور 


فقیر شہر کے گھر شہریار کیا اتریں 


ہمیں مجال نہیں ہے کہ بام تک پہنچیں 


انہیں یہ عار سر رہ گزار کیا اتریں 


جو زخم داغ بنے ہیں وہ بھر گئے تھے فرازؔ 


جو داغ زخم بنے ہیں وہ یار کیا اتریں 

ये बे-दिली है तो कश्ती से यार क्या उतरें 


उधर भी कौन है दरिया के पार क्या उतरें 


तमाम दौलत-ए-जाँ हार दी मोहब्बत में 


जो ज़िंदगी से लिए थे उधार क्या उतरें 


हज़ार जाम से टकरा के जाम ख़ाली हों 


जो आ गए हैं दिलों में ग़ुबार क्या उतरें 


बसान-ए-ख़ाक सर-ए-कू-ए-यार बैठे हैं 


अब इस मक़ाम से हम ख़ाकसार क्या उतरें 


न इत्र ओ ऊद न जाम ओ सुबू न साज़ ओ सुरूर 


फ़क़ीर-ए-शहर के घर शहरयार क्या उतरें 


हमें मजाल नहीं है कि बाम तक पहुँचें 


उन्हें ये आर सर-ए-रहगुज़ार क्या उतरें 


जो ज़ख़्म दाग़ बने हैं वो भर गए थे 'फ़राज़' 


जो दाग़ ज़ख़्म बने हैं वो यार क्या उतरें 


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